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ओशो: मृत्यु नहीं, महासमाधि का उत्सव

ओशो: मृत्यु नहीं, महासमाधि का उत्सव

19 जनवरी 1990 – एक ऐसा दिन जब पुणे के कोरेगांव पार्क स्थित ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिसॉर्ट में *भगवान श्री रजनीश* (ओशो) ने अपना शरीर त्याग दिया। उम्र महज *58 वर्ष। आधिकारिक रूप से मौत का कारण **हृदय गति रुकना* बताया गया, लेकिन उनके लाखों सन्यासियों के लिए यह कोई साधारण अंत नहीं था। यह थी *महासमाधि* – जीवन की पराकाष्ठा, चेतना का पूर्ण विलय और एक नए द्वार का खुलना।

ओशो ने जीवन भर यही संदेश दिया:  
*"मैं न कभी जन्मा, न कभी मरा।*  
मैं तो बस तुम्हारे भीतर हूं – जब तुम बाहर ढूंढते हो, तब मुझे खो देते हो।"

उनके अंतिम दिनों की झलक बहुत गहन थी। 1989 के बाद वे मौन में रहे, श्वेत वस्त्र पहने, शिष्यों के साथ गहन एकाग्रता में। कोई अंतिम प्रवचन नहीं, बस शांति और मौन की ऊर्जा। जब 19 जनवरी की सुबह शरीर छूटा, तो आश्रम में कोई विलाप नहीं हुआ। इसके बजाय हुआ *नाच, गान, ध्यान और हंसी का उत्सव* – क्योंकि ओशो ने सिखाया था:

*"मृत्यु को रोना नहीं, जियो।*  
जैसे जीवन को पूरे उत्साह से जीते हो, वैसे ही मृत्यु को भी जागरूकता के साथ जियो।"


लव कुमार की कलम से